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चलता-फिरता प्रेत : मानव-काल एक गहन दार्शनिक और प्रतीकात्मक रचना है, जिसमें लेखक ने आधुनिक मानव की मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक स्थिति का चित्रण किया है। यह किताब बताती है कि कैसे भौतिकवाद और अंधी दौड़ के बीच इंसान जीवित होकर भी एक "प्रेत" जैसा बन गया है।