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"Yaar Papa" एक मासूम बच्चे की नजर से दुनिया को देखने का एक अनोखा नजरिया है। यह किताब पिता और बेटे के रिश्ते को इतनी सादगी, मासूमियत और गहराई से दर्शाती है कि पढ़ने वाला खुद उस बच्चे की भावनाओं में खो जाता है। विनोद कुमार शुक्ल की भाषा सरल है लेकिन भावनाएं बेहद गहरी। ये उपन्यास पाठकों को अपने बचपन, अपने पिता और उन अनकही बातों की याद दिलाता है जो हम कह नहीं पाते।